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Late Inder Mani Badoni :

उतरराखण्ड के कोने- कोने में अलख जगाकर वर्षो से चली आ रही राज्य प्राप्ति की मां को जिस व्यक्ति ने अभिव्यक्ति प्रदान कर प्रत्येक पहाड़ी को आज दो- अभी दो का नारा लगाने से मुठ्टियां तानकर सरकार को ललकारने का माद्दा प्रदान किया वे कोई और नहीं स्व. इन्द्रमणी बड़ोनी जी थे। उन्होने पहाड़ की मजबूरियों को नजदीक से देखा था। पहाड़ के आदमी के पलायन की मजबूरी पहाड़ी बुजुर्गो के आंखों का खालीपन व महिलाओं की जिंदगी का सूनापन उन्हें हमेशा विचलित करता था। 23 दिसम्बर 1924 को टिहरी जिलें के जखोली विकासखण्ड के अखोड़ी गांव में सुरेशादंद बडोनी जी केघर जन्म लेने वाले इन्द्रमणी बडोनी जी की राजनैतिक कार्यशैली ने उन्हें उत्तराखंण्ड के घर- घर में एक अलग पहचान दिलायी। आज के चाटुकारिता व तड़क- भड़क से भरे राजनैतिक जीवन से अलग उन्होंने हमेशा फक्कड़ जीवन जिया।

उत्तराखण्ड के गांधीजी कहे जाने वाले स्व. इन्द्रमणि बडोनी जी देवप्रयाग विधान सभी क्षेत्र से तीन बार विधायक रह चुके है जहां से ये ऋषिकेश आकर रहने लगे थे । इन्द्रमणि बड़ोनी सन् 1967 में पहली बार निर्दलीय रूप से विधायक चुने गये बाद में इन्होने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। 1969 में ये कांग्रेस के टिकट पर पुन विधान सभा में पहुंचे। लेकिन कुछ समय बाद इन्होने कांग्रेस की सदस्यता छोड़ छी1977 में ये उ प्र विधान सभी के लिए तीसरी बाद विधायक चुने गये। 1973 में पर्वतीय राज्य परिषद में माध्यम से भी बड़ोनी जी पृथक राज्य के लिए सक्रिय रहे। पृथक राज्य के प्रति क्षेत्रीय जनता में जागृति पैदा करने के लिए इन्होने तवाधाट से देहरादून तक लगभग 2000 किमी की पदयात्रा भी की थी। 1979उत्तराखण्ड क्रांति दल का जन्म होने के बाद बडोनी जी ने उक्रांद की सदस्यता गंहण कर ये जीवन की अंतिम क्षणों तक उक्रांद मे बने रहे। उत्तराखण्ड क्रांति दल के नेतृत्व में राज्य आंदोलन अपनी मंजिल की ओर अग्रसर था ही कि 1994 के मध्य दौर में छात्र, जबरदस्ती लादे जा रहे 27 प्रतिशत आरक्षण को दुरस्त करने के संघर्ष में सड़को पर कुछ पड़े छात्र- नौजवान मजदूर- किसान के उस दौर में हो रहे संघर्षो ने पृथक राज्य आंदोलन को एक नई ऊर्जा प्रदान की। कर्मचारी, व्यापारी, भूतपूर्व सैनिक ही नहीं बुद्धिजीवी भी संघर्ष में कूद पडा1। मातृशकित की ऐतिहासिक भागीदारी ने इस आंदोलन को देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लोकतांत्रिक संघर्षो के इतिहास में एक मिशाल के रूप में स्थापित कर दिया। राज्य आंदोलन की चिंगारी ज्वाला बनकर जब सम्पूर्ण उत्तराखंड मे घर-घर तक फैली तो दिल्ली व लखनऊ की सरकारें सहम गयी। जन आंदोलन पर हुए कायरतापूर्ण हमलों तथा पहाड़ के सम्मान पर की गयी बहसी चोट पर लिमिलाये उत्तराखण्डी जब आक्रोशित होकर सड़कों पर उतरे तो बडोनी जी ने किसी भी अनहोनी के हाने से पहले जनता के आकोश को एक पैनी धार देकर उसे राज्य प्राप्ति की आर- पार की लड़ाई में बदल दिया। यह उनका कुशल नेतृत्व ही था कि जनता जवाब में प्रतिहिंसा पर नहीं उतरी और लोकतांत्रिक मार्यादाओं के तहत शांतिपूर्ण संघर्ष करती रही अंतत: राज्य प्राप्त करने में सफल हुई।42 से अधिक शहादतें होने, मातृशक्ति का अपमान सहने के बावजूद आंदोलन अहिंसा के मार्ग से विचलित नहीं हुआ। ये वह तथ्य व सच्चाईयां हैं जिन्होंने इन्द्रमणी बडोनी को पर्वतीय गांधी का दर्जा दिया


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